सन्नी शारद, रांची
झारखंड के खूंटी जिले के सिल्दा गांव में इन दिनों जश्न का माहौल है। डीजे की धुन पर गांव की महिलाएं आदिवासी रीति-रिवाजों के साथ झूम रही हैं। एक काले रंग की गाड़ी के सनरूफ से बाहर निकला दुबला-पतला युवक फूलों की मालाओं से लदा है और उसके पीछे गाड़ियों का लंबा काफिला चल रहा है। नजारा ऐसा मानो गांव में कोई वीआईपी पहुंच गया हो। यह दृश्य उस वक्त का है, जब नेशनल पैरा आर्चरी खिलाड़ी जोंगो पाहन दुबई में आयोजित एशियन यूथ पैरा गेम्स 2025 से मेडल जीतकर गांव लौटे।
गोल्ड और सिल्वर मेडल से बढ़ाया मान
दुबई में आयोजित एशियन पैरा गेम्स में जोंगो पाहन ने मिक्स इवेंट में गोल्ड और सिंगल इवेंट में सिल्वर मेडल जीतकर देश का नाम रोशन किया। उनकी यह उपलब्धि इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि गोल्ड मेडल के मुकाबले में उन्होंने चीन के मजबूत खिलाड़ी को हराया।

खपड़ैल का घर, बिजली तक नहीं
जोंगो पाहन बेहद ही गरीब परिवार से आते हैं। पूरा परिवार एस्बेस्टस और खपड़ैल के घर में रहता है। सरकार की 200 यूनिट मुफ्त बिजली योजना के बावजूद आज तक उनके घर में बिजली कनेक्शन नहीं पहुंच पाया है। पिता गाय, बैल और बकरियां चराते हैं और जरूरत पड़ने पर दिहाड़ी मजदूरी भी करते हैं।
दिल्ली का सफर गार्ड रूम में
जोंगो पाहन के स्वागत में आयोजित कार्यक्रम के दौरान स्थानीय सांसद के प्रतिनिधि ने बताया कि जब जोंगो रांची से दिल्ली के लिए रवाना हुए थे, तब ट्रेन में उनका टिकट कन्फर्म नहीं हो पाया था। डीआरएम से संपर्क के बावजूद समाधान नहीं निकला। मजबूरी में जोंगो को ट्रेन के गार्ड रूम में बैठकर सफर करना पड़ा और इसके लिए उन्हें जुर्माना भी भरना पड़ा। आज जोंगो पाहन की कहानी न सिर्फ खूंटी बल्कि पूरे झारखंड के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है, जहां संघर्ष भी है और सपनों की उड़ान भी।
